एक नई शुरुवात !


गुरु चरणों में नमन !

 अंग्रेजी का एक शब्द है 'रिस्पांसिबिलिटी' - इसका हिंदी अनुवाद 'ज़िम्मेदारी' है।  हम सब  इस शब्द को समझते हैं।  हमने अक्सर 'be responsible' यह वाक्य अखबारों में , सोशल मीडिया पर और अपने परिजनों से भी सुनते हैं ! युवा पीढ़ी से भी ये ही अपेक्षा है की वे ज़िम्मेदार बनें। 

                                                                हम इस बात से भी भली भाँति परिचित हैं कि ज़िम्मेदारी और आरोपण  (Blame ) ये दोनों अलग-अलग शब्द हैं जिनके अर्थ मेल नहीं  खाते।   ज़िम्मेदार होने से हम अपने जीवन  में आगे बढ़ते हैं , नई  चुनौतियों का सामना करते हैं। हमारे जीवन में हम दूरदर्शिता क साथ निर्णेय ले पाते हैं।  कोई भी समझदार व्यक्ति आरोपित नहीं होना चाहता।  

यदि हमें  चुनाव करना हो , हम क्या चुनेंगे ? 

 उदहारण के  लिए हमे हमारे पर्यावरण को स्वच्छ बनाना है , हम इसे प्रदुषण मुक्त करने के लिए  ज़िम्मेदार हैं अथवा आने वाला समय हमे दोषी ज़रूर घोषित करेगा।   गौर फ़रमाइये , मैंने कहा आपके पास दो रास्ते हैं , आपको चुनाव करना है। हर रास्ते का अपना अंजाम है पर यदि आपके पास चॉइस न हो तो आप क्या करेंगे  ? 

 बरेहाल , महिलाओं को भी ज़िम्मेदार ठहराया जाता है पर विडम्बना है - उनके व्यहवार के लिए नहीं। फेयरवेल में साड़ी नहीं पहनना चाहिए , यह विकर्षण (distraction) है , कमाल है ना ? महिलाओं के लिए विकर्षण नहीं  है पर ज़िम्मेवार तो वो ही हैं।  यदि एक महिला  स्कर्ट पहन कर ऑफिस जाती है तो हर्रास्मेंट के लिए तो आप जानते ही हैं कौन ज़िम्मेदार है ? कुछ सहेलियों से बात चीत करने पर ज्ञात हुआ कि दस डिग्री  वाली ठण्ड में मास्क लगाकर टोपी पहनकर  तीन चार लेयर कपड़ो के बाद भी गली मोहल्लों में छेड़खानी के किस्से सामने आ रहे हैं।  

निसंदेह यह  महिला-जिम्मेदारी सम्बन्ध घिनौना है।  यह महिलाओं से उनके  मानवीय हक़ सवतंत्रता को छीन लेता है। 

इसी सम्बन्ध का एक रूप - हमारी भाषा में उपस्थित गालियाँ हैं जो कि अकसर महिलाओं को टारगेट करती हैं।  क्यूंकि शायद महिलाओं कि अपनी कोई पहचान (आइडेंटिटी)नहीं है , वो प्राइवेट प्रॉपर्टी हैं - इज़्ज़त बनाए रखने  के लिए। इसीलिए वे घरेलू हिंसा और मैरिटल रेप का शिकार होती हैं।  

इलाका  ग्रामीण हो या हो शहरी , कोई भी वर्ग हो , पैतृक व्‍यवस्‍था विश्वव्यापी है ।  अब महिलाएं यमराज से भले ही युद्ध जीत लें , उन्हें अपनी पूर्णता पति के पाँव छू कर ही मिलती है , सर नेम बदलना ही एक आदर्श महिला की पहचान समझा जाता है।  

अक्सर आपने आपसी बात चीत में सुना होगा - युद्ध के पीछे महिलाएं हैं।  रामायण महाभारत ही देख लीजिए। मानवीय अहंकार और लालच से युद्ध नहीं होते अपितु एक स्री हरण और दूसरी तरफ दाव पर लगने वाली स्री ही दोषी ठहरा दिए जाते हैं ! (महिला-जिम्मेदारी सम्बन्ध) 

फलस्वरूप उन्हें  मोक्षा ( लिबरेशन)  का अधिकार नहीं  हैं।  उन्हें पहले पुरुष बन कर जन्म लेना  होगा और तभी वे  मोक्ष के लिए काबिल होंगी।  इस मानसिकता अनुसार महिला वर्ग  सौंदर्य  समृद्ध है और वह अपनी  ब्यूटी से ऊपर कदापि नहीं उठ सकता। पाश्चात्य संस्कृति में  भी संसार के लिए आदम नहीं ईव ज़िम्मेदार थी और वहाँ  भी वीमेन (महिला वर्ग ) को डेफोर्मेड मेन (विकृत पुरुष ) कहा गया है।

आश्चर्य की बात है - इतनी ज़िम्मेदार महिलाएं जो इस संसार रूपी माया के लिए ज़िम्मेदार है वो अपने मन मुताबिक है हस बोल भी  नहीं सकती हैं।  उन्हें कॉर्पोरेट में जाने की अनुमति नहीं है क्यूंकि घर संभालना उनका कर्त्तव्य है।  पर इसी घर में कभी उनके पसंद की सब्ज़ी नहीं बनेगी।  

हम उसी समाज का हिस्सा हैं जिसने भगवन बुध के संसार त्याग कर , पूरे विश्व की  ज़िम्मेदारी लेने पर उनकी सराहना की थी किन्तु यदि कोई देवी, योगिनी , ब्रह्मचारिणी ऐसा करना चाहे तो उसे अनुमति नहीं हैं।  

 अनुमति लेने की आवश्यकता है ! 

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